ग्रंथश्रीमद्भगवद्गीताअध्याय 1818.53श्रीमद्भगवद्गीता 18.53अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।18.53।।पिछलाअगलापूरा अध्याय