ग्रंथश्रीमद्भगवद्गीताअध्याय 1818.52श्रीमद्भगवद्गीता 18.52विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः।।18.52।।पिछलाअगलापूरा अध्याय