सूक्त 33
33.1
पाप-नाशनम् १-८ ब्रह्म। पाप्मनाशनोऽग्निः। गायत्री।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम्।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥१॥
33.2
सु॒क्षे॒त्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे ।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥२॥
33.3
प्र यद् भन्दि॑ष्ठ एषां॒ प्रास्माका॑सश्च सू॒रयः॑ ।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥३॥
33.4
प्र यत् ते॑ अग्ने सू॒रयो॒ जाये॑महि॒ प्र ते॑ व॒यम्।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥४॥
33.5
प्र यद॒ग्नेः सह॑स्वतो वि॒श्वतो॒ यन्ति॑ भा॒नवः॑ ।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥५॥
33.6
त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वतः॑ परि॒भूरसि॑ ।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥६॥
33.7
द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय ।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥७॥
33.8
स नः॒ सिन्धु॑मिव ना॒वाति॑ पर्ष स्व॒स्तये॑ ।
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥८॥