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अथर्ववेद 68.5

उ॒त ब्रु॑वन्तु नो॒ निदो॒ निर॒न्यत॑श्चिदारत । दधा॑ना॒ इन्द्र॒ इद् दुवः॑ ॥५॥

पूरा अध्याय