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सूक्त 50

50.1

कन्नव्यो॑ अत॒सीनां॑ तु॒रो गृ॑णीत॒ मर्त्यः॑ ।
न॒ही न्व॑स्य महि॒मान॑मिन्द्रि॒यं स्वर्गृ॒णन्त॑ आन॒शुः ॥१॥

50.2

कदु॑ स्तु॒वन्त॑ ऋतयन्त दे॒वत॒ ऋषिः॒ को विप्र॑ ओहते ।
क॒दा हवं॑ मघवन्निन्द्र सुन्व॒तः कदु॑ स्तुव॒त आ ग॑मः ॥२॥

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