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सूक्त 134

134.1

खिलानि ।

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धरा॒ग् – अरा॑ला॒गुद॑भर्त्सथ ॥१॥

134.2

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – व॒त्साः पुरु॑षन्त आसते ॥२॥

134.3

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – स्थाली॑पाको॒ वि ली॑यते ॥३॥

134.4

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – स वै॑ पृ॒थु ली॑यते ॥४॥

134.5

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – आष्टे॑ लाहणि॒ लीशा॑थी ॥५॥

134.6

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धराग् – अक्ष्लि॑ली॒ पुच्छिली॑यते ॥६॥

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