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अथर्ववेद 127.4

वच्य॑स्व रेभ॑ वच्यस्व वृ॒क्षे न प॒क्वे श॒कुनः॑ ।
नष्टे॑ जि॒ह्वा च॑र्चरीति क्षु॒रो न भु॒रिजो॑रिव ॥४॥

पूरा अध्याय