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अथर्ववेद 11.5

शु॒क्रोऽसि भ्रा॒जोऽसि॒ स्वऽरसि॒ ज्योति॑रसि ।
आ॒प्नु॒हि श्रेयां॑स॒मति॑ स॒मं क्रा॑म ॥५॥

पूरा अध्याय