शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 6.15
मन॑स्त॒ आ प्या॑यतां॒ वाक्त॒ आ प्या॑यतां प्रा॒णस्त॒ आ प्या॑यतां॒ चक्षु॑स्त॒ आ प्या॑यतां॒j
श्रोत्रं॑ त॒ आ प्या॑यताम् । यत्ते॑ क्रू॒रं यदास्थि॑तं॒ तत्त॒ आ प्या॑यतां॒ निष्ट्यायतां॒ तत्ते॑ शुध्यतु शमहो॑भ्यः ।
ओष॑धे॒ त्राय॑स्व॒ स्वधि॑ते॒ मैन॑ᳪ हिᳪसीः ॥१५॥