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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 4.14

अग्ने॒ त्वᳪ सु जा॑गृहि व॒यᳪ सु म॑न्दिषीमहि । रक्षा॑ णो॒ अप्र॑युच्छन् प्र॒बुधे॑ न॒ः पुन॑स्कृधि ॥१४॥

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