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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 33.73

दै॑व्यावध्वर्यू॒ आ ग॑त॒ᳪ रथे॑न॒ सूर्य॑त्वचा । मध्वा॑ य॒ज्ञᳪ सम॑ञ्जाथे ।
तं प्र॒त्नथा॒ ऽयं वे॒नः ॥७३॥

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