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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 22.5

प्र॒जाप॑तये त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मीन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि वा॒यवे॑ त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि॒
विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्यो॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि॒ सर्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्यो॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि ।
यो अर्व॑न्तं॒ जिघा॑ᳪसति॒ तम॒भ्य॒मीति॒ वरु॑णः| प॒रो मर्त॑ः प॒रः श्वा ॥५॥

पूरा अध्याय