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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 18.65

यत्र॒ धारा॒ अन॑पेता॒ मधो॑र्घृ॒तस्य॑ च॒ याः । तद॒ग्निर्वै॑श्वकर्म॒णः स्व॑दे॒र्वेषु॑ नो दधत् ॥६५॥

पूरा अध्याय