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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 18.32

वाजो॑ नः स॒प्त प्र॒दिश॒श्चत॑स्रो वा परा॒वत॑ः । वाजो॑ नो॒ विश्वै॑र्दे॒वैर्धन॑सातावि॒हाव॑तु ॥३२॥

पूरा अध्याय