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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 17.53

उदु॑ त्वा॒ विश्वे॑ दे॒वा अग्ने॑ भरन्तु॒ चित्ति॑भिः । स नो॑ भव शि॒वस्त्वᳪ सु॒प्रती॑को वि॒भाव॑सुः ॥५३॥

पूरा अध्याय