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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 17.50

उदे॑नमुत्त॒रां न॒याग्ने॑ घृतेनाहुत । रा॒यस्पोषे॑ण॒ सᳪ सृ॑ज प्र॒जया॑ च ब॒हुं कृ॑धि ॥५०॥

पूरा अध्याय