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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 17.5

हि॒मस्य॑ त्वा ज॒रायु॒णाऽग्ने॒ परि॑ व्ययामसि । पा॒व॒को अ॒स्मभ्य॑ᳪ शि॒वो भ॑व ॥५॥

पूरा अध्याय