शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 14.17
आयु॑र्मे पाहि प्रा॒णं मे॑ पाह्यपा॒नं मे॑ पाहि व्या॒नं मे॑ पाहि॒ चक्षु॑र्मे पाहि॒
श्रोत्रं॑ मे पाहि॒ वाचं॑ मे पिन्व॒ मनो॑ मे जिन्वात्मानं॑ मे पाहि॒ ज्योति॑र्मे यच्छ ॥१७॥
आयु॑र्मे पाहि प्रा॒णं मे॑ पाह्यपा॒नं मे॑ पाहि व्या॒नं मे॑ पाहि॒ चक्षु॑र्मे पाहि॒
श्रोत्रं॑ मे पाहि॒ वाचं॑ मे पिन्व॒ मनो॑ मे जिन्वात्मानं॑ मे पाहि॒ ज्योति॑र्मे यच्छ ॥१७॥