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शुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन) 12.80

यत्रौ॑षधीः स॒मग्म॑त॒ राजा॑न॒ः समि॑ताविव । विप्र॒ः स उ॑च्यते भि॒षग्र॑क्षो॒हामी॑व॒चात॑नः ॥८०॥

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