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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 6.64

घृ॒तेना॒क्तौ प॒शूँस्त्रा॑येथा॒ᳪ रेव॑ति॒ यज॑माने । प्रि॒यं धा आवि॑श ॥६॥

पूरा अध्याय