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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 6.57

तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दᳪ सदा॑ पश्यन्ति सू॒रयः॑ । दि॒वी॑व॒ चक्षु॒रात॑तम् ॥६॥

पूरा अध्याय