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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 6.55

३ (२९३)
ब्र॒ह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ रायस्पोष॒वनि॒ पर्यू॑हामि ।
ब्रह्म॑ दृᳪह क्ष॒त्रं दृ॒ᳪहायु॑र्दृᳪह प्र॒जां दृ॑ᳪह ॥४॥

पूरा अध्याय