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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 6.17

देवी॑रापः शु॒द्धा वो॑ढ्व॒ᳪ सुप॑रिविष्टा दे॒वेषु॑ । सुप॑रिविष्टा व॒यं प॑रिवे॒ष्टारो॑ भूयास्म ॥२॥

पूरा अध्याय