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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 5.55

अ॒यᳪ हि त्वा॒ स्वधि॑ति॒स्तेति॑जानः प्रणि॒नाय॑ मह॒ते सौभ॑गाय ।
अत॒स्त्वं दे॑व वनस्पते श॒तव॑ल्शो॒ विरो॑ह स॒हस्र॑वल्शा॒ वि व॒यᳪ रु॑हेम ॥५॥

पूरा अध्याय