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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 5.53

तं त्वा॑ जुषामहे देव वनस्पते देवय॒ज्यायै॑ । दे॒वास्त्वा॑ देवय॒ज्यायै॑ जुषन्तां॒ विष्ण॑वे त्वा ॥३॥

पूरा अध्याय