शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 5.17
सि॒ᳪह्य॑सि ब्रह्म॒वनिः॑ क्षत्र॒वनिः॒ स्वाहा॑ सि॒ᳪह्य॑सि सुप्रजा॒वनी॑ रायस्पोष॒वनिः॒ स्वाहा॑ ।
सि॒ᳪह्य॒स्याव॑ह दे॒वान्यज॑मानाय॒ स्वाहा॑ भू॒तेभ्य॑स्त्वा ॥३॥
सि॒ᳪह्य॑सि ब्रह्म॒वनिः॑ क्षत्र॒वनिः॒ स्वाहा॑ सि॒ᳪह्य॑सि सुप्रजा॒वनी॑ रायस्पोष॒वनिः॒ स्वाहा॑ ।
सि॒ᳪह्य॒स्याव॑ह दे॒वान्यज॑मानाय॒ स्वाहा॑ भू॒तेभ्य॑स्त्वा ॥३॥