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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 4.43

वने॑षु॒ व्य॒न्तरि॑क्षं ततान॒ वाज॒मर्व॑त्सु॒ पय॑ उ॒स्रिया॑सु ।
हृ॒त्सु क्रतुं॒ वरु॑णो वि॒क्ष्व॒ग्निं दि॒वि सूर्य॑मदधा॒त् सोम॒मद्रौ॑ ॥२॥

पूरा अध्याय