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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 4.41

प्रति॒ पन्था॑मपद्महि स्वस्ति॒गाम॑ने॒हस॑म् । येन॒ विश्वाः॒ परि॒ द्विषो॑ वृ॒णक्ति॑ वि॒न्दते॒ वसु॑ ॥६॥

पूरा अध्याय