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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 4.27

सा दे॑वि दे॒वमच्छे॒हीन्द्रा॑य॒ सोम॑म्। रु॒द्रस्त्वा व॑र्तयतु स्व॒स्ति सोम॑सखा॒ पुन॒रेहि॑ ॥५॥

पूरा अध्याय