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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 39.3

मन॑सः॒ काम॒माकू॑तिं वा॒चः स॒त्यम॑शीय ।
प॒शू॒नाᳪ रू॒पमन्न॑स्य॒ रसो॒ यशः॒ श्रीः श्र॑यतां॒ मयि॒ स्वाहा॑ ॥२॥

पूरा अध्याय