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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 38.8

इन्द्रा॑य त्वा॒ वसु॑मते रु॒द्रव॑ते॒ स्वाहेन्द्रा॑य त्वादि॒त्यव॑ते॒ स्वाहा॑ ।
इन्द्रा॑य त्वाभिमाति॒घ्ने स्वाहा॑ सवि॒त्रे त्व॑ ऋभु॒मते॑ विभु॒मते॒ वाज॑वते॒ स्वाहा॒ बृह॒स्पत॑ये त्वा वि॒श्वदे॑व्यावते॒ स्वाहा॑ ॥२॥

पूरा अध्याय