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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 35.46

अ॒न॒ड्वाह॑म॒न्वार॑भामहे स्व॒स्तये॑ ।
स न॒ इन्द्र॑ इव दे॒वेभ्यो॒ वह्निः॑ सं॒तर॑णो भव ॥१२॥

पूरा अध्याय