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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 33.44

उत्ति॑ष्ठ ब्रह्मणस्पते देव॒यन्त॑स्त्वेमहे ।
उप॒ प्र य॑न्तु म॒रुतः॑ सु॒दान॑व॒ इन्द्र॑ प्रा॒शूर्भ॑वा॒ सचा॑ ॥१९॥

पूरा अध्याय