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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 32.65

६४ (१८४२)
आ तू न॑ इन्द्र वृत्रहन्न॒स्माक॑म॒र्धमा ग॑हि । म॒हान्म॒हीभि॑रू॒तिभिः॑ ॥११॥

पूरा अध्याय