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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 32.45

इ॒न्द्रवा॒यू बृह॒स्पतिं॑ मि॒त्राग्निं पू॒षणं॒ भग॑म् । आ॒दि॒त्यान्मारु॑तं ग॒णम् ॥२॥

पूरा अध्याय