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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 31.13

जी॒मूत॑स्येव भवति॒ प्रती॑कं॒ यद्व॒र्मी याति॑ स॒मदा॑मु॒पस्थे॑ ।
अना॑विद्धया त॒न्वा॑ जय॒ त्वᳪ स त्वा॒ वर्म॑णो महि॒मा पि॑पर्तु ॥२॥

पूरा अध्याय