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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 3.30

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम् । नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि ॥१४॥

पूरा अध्याय