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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 3.27

सं प्रि॒येण॒ धाम्ना॒ सम॒हमायु॑षा॒ सं वर्च॑सा॒ सं प्र॒जया॒ सᳪ रा॒यस्पोषे॑ण ग्मिषीय ।
अन्ध॒ स्थान्धो॑ वो भक्षीय॒ मह॑ स्थ॒ महो॑ वो भक्षीय ॥११॥

पूरा अध्याय