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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 25.42

ऋ॒तव॑स्त ऋतु॒था पर्व॑ शमि॒तारो॒ वि शा॑सतु ।
सं॒व॒त्स॒रस्य॒ तेज॑सा श॒मीभिः॑ शम्यन्तु त्वा ॥२॥

पूरा अध्याय