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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 25.34

द॒धि॒क्राव्णो॑ अकारिषं जि॒ष्णोरश्व॑स्य वा॒जिनः॑ ।
सु॒र॒भि नो॒ मुखा॑ कर॒त्प्र ण॒ आयू॑ᳪषि तारिषत् ॥१२॥

पूरा अध्याय