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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 24.16

सु॒ष्टु॒तिᳪ सु॑मती॒वृधो॑ रा॒तिᳪ स॑वि॒तुरी॑महे । प्र दे॒वाय॑ मती॒विदे॑ ॥४॥

पूरा अध्याय