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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 23.8

आ नो॑ मित्रावरुणा घृ॒तैर्गव्यू॑तिमुक्षतम् । मध्वा॒ रजा॑ᳪसि सुक्रतू ॥८॥

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