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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 22.54

तमिन्द्रं॑ प॒शवः॒ सचा॒श्विनो॒भा सर॑स्वती । दधा॑ना अ॒भ्य॑नूषत ह॒विषा॑ य॒ज्ञ इ॑न्द्रि॒यैः ॥३॥

पूरा अध्याय