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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 21.53

त्वᳪ सो॑म॒ प्रचि॑कितो मनी॒षा त्वᳪ रजि॑ष्ठ॒मनु॑ नेषि॒ पन्था॑म् ।
तव॒ प्रणी॑ती पि॒तरो॑ न इन्दो दे॒वेषु॒ रत्न॑मभजन्त॒ धीराः॑ ॥२॥

पूरा अध्याय