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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 21.45

पव॑मानः॒ सो अ॒द्य नः॑ प॒वित्रे॑ण॒ विच॑र्षणिः । यः पोता॒ स पु॑नातु मा ॥१३॥

पूरा अध्याय