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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 21.17

आ॒स॒न्दी रू॒पᳪ रा॑जास॒न्द्यै वेद्यै॑ कु॒म्भी सु॑रा॒धानी॑ ।
अन्त॑र उत्तरवे॒द्या रू॒पं का॑रोत॒रो भि॒षक् ॥५॥

पूरा अध्याय