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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 20.41

वै॒श्वा॒न॒रो न॑ ऊ॒तय॒ आ प्र या॑तु परा॒वतः॑ । अ॒ग्निर्नः॑ सुष्टु॒तीरुप॑ ॥५॥

पूरा अध्याय