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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 20.24

दि॒वो मू॒र्धासि॑ पृथि॒व्या नाभि॒रूर्ग॒पामोष॑धीनाम् ।
वि॒श्वायुः॒ शर्म॑ स॒प्रथा॒ नम॑स्प॒थे ॥४॥

पूरा अध्याय