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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 2.60

ऊर्जं॒ वह॑न्तीर॒मृतं॑ घृ॒तं पयः॑ की॒लालं॑ परि॒स्रुत॑म् ।
स्व॒धा स्थ॑ त॒र्पय॑त मे पि॒तॄन् ॥७॥

पूरा अध्याय