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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 2.19

(२) १८
देव॑ सवितरे॒तं त्वा॑ वृणते॒ बृह॒स्पतिं॑ ब्र॒ह्माण॑म्। तद॒हं मन॑से॒ प्रब्र॑वीमि ॥१॥

पूरा अध्याय